हिन्दी-पुरोधा पं. अरिबम राधामोहन शर्मा

1903 – 1997

 

अरिबम पंडित राधामोहन शर्मा भारत के उन कुछ गिने-चुने हिन्दी सेवकों में से थे, जिन्होंने पहले पहल स्वाधीन राष्ट्र के लिए एक राष्ट्र-भाषा का सपना देखा| उन्होंने जनता की भाषा हिन्दी और भारत राष्ट्र के लिए अपना पूरा जीवन होम दिया| भारत में हिन्दी को व्यापक जन-स्वीकृति की भाषा बनाने वाले महापुरुषों में पंडित राधामोहन शर्मा का नाम अग्रणी है|

राधामोहन जी का जन्म 24 मार्च सन् 1903 में मणिपुर की राजधानी, इम्फाल के ब्रह्मपुर अरिबम लैकाई नामक स्थान पर हुआ था| उनकी माता का नाम माइपाकपी देवी और पिता का नाम अरिबम पूर्णचंद्र शर्मा (इबुङोचाओबा) था| वे अपने तीन भाइयों में मँझले थे| किशोरावस्था तक आते-आते राधामोहन जी के माता-पिता का स्वर्गवास हो गया, अत: उनका भावी लालन-पालन उनके चाचा पंडित अरिबम थम्बौ के संरक्षण में हुआ| राधामोहन जी के प्रथम शिक्षा-गुरु आदरणीय चंद्रशेखर शर्मा (उपुसना) थे| उन्हीं के घर पंडित जी ने छ: वर्ष की आयु से शिक्षा प्राप्त करना प्रारम्भ कर दिया था| उसी अवधि में उन्हें पौरोहित्य-विद्या को भी आत्मसात कर लिया था| इसके पश्चात उन्हें श्री-श्री गोविंदजी ब्रह्मसभा के व्यवस्थाकारी पंडित परीक्षित शर्मा का  शिष्यत्व प्राप्त हुआ| उन्होंने संस्कृत टोल से प्रथमाऔर मध्यमापरीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं| इस उपलब्धि के फलस्वरूप उन्हें तत्कालीन मणिपुर महाराज चुड़ाचांद द्वारा राजकीय छात्रवृत्ति प्रदान की गई और वे काशी तथा नवद्वीप जाकर विद्याध्ययन करने में सफल हुए| उन्होंने बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय, काशी केप्राच्य विभाग में अध्ययन किया था| इसके पश्चात नवद्वीप में रह कर उन्होंने न्याय शास्त्र का अध्ययन पूर्ण किया था| राधामोहन जी ने कलकत्ता संस्कृत एसोसिएशनसे न्याय रत्नतर्क तीर्थउपाधियाँ प्राप्त कीं| उन्होंनेबंग बिबुध जननी सभाकी न्याय रत्नउपाधि भी प्राप्त की थी| अर्जित पदक भी मिला |

पंडित राधामोहन शर्मा विद्याध्ययन पूर्ण करके सन् 1927 में मणिपुर लौट आए और ब्रह्मपुर संस्कृत टोल में अध्यापन कार्य करने लगे| उन्होंने कुछ समय तक थाङमैबन्द संस्कृत टोल में भी अध्यापन किया| उन्हें शीघ्र ही तत्कालीन मणिपुरेश्वर ने श्री श्री गोविंदजी ब्रह्मसभा का रत्ननियुक्त किया तथाविद्यालंकारउपाधि से अलंकृत किया| जब ऋषिकेश नगर में धर्म-समेलन हुआ, तो महाराजा बोधचंद्र ने पंडित जी को मणिपुर का प्रतिनिधित्व करने भेजा| वहाँ उन्होंने अपने धर्म तथा संस्कृति संबंधी ज्ञान से सभी को चमत्कृत कर दिया|

यद्यपि पंडित राधामोहन शर्मा काशी में संस्कृत का अध्ययन करने गए थे, किन्तु वहाँ रहते हुए उन्होंने हिन्दी भाषा पर भी अधिकार कर लिया| यह वह काल था, जब हिन्दी भारत के स्वाधीनता संग्राम की प्रमुख भाषा बन गई थी और बिना किसी भेदभाव के हिन्दी तथा हिंदीतर भाषी स्वाधीनता सेनानी उसे भावी राष्ट्र-भाषा के रूप में देखने लगे थे| इनमें सबसे प्रेरक महापुरुष महात्मा गांधी थे| राधामोहन जी काशी में ही गांधी जी से प्रभावित हुए थे; इसीलिए उन्होंने मणिपुर आकर संस्कृत से आजीविका कमाने के बावजूद इस राज्य के लोगों को हिन्दी सिखाने का संकल्प किया|

यह एक संयोग ही था कि स्वाधीनता और हिन्दी के बारे में जैसे विचार पंडित राधामोहन शर्मा के थे, वैसे ही थोकचोम मधु सिंह के भी थे| यह वैचारिक समानता उस युग की इन दो विभूतियों को निकट लाई और इन्होंने मिल कर मणिपुर में हिन्दी का प्रचार करना शुरू कर दिया| किन्तु यह कोई आसान कार्य नहीं था| हिन्दी प्रचार करने के लिए इम्फाल नगर के बाहर दूर-दूर के छोटे कस्बों और गाँवों में जाना था, लेकिन यातायात की सुविधाएँ नहीं थीं| हिन्दी सिखाने का उत्साह मन में भरे राधामोहन जी और मधु सिंह जी थे, लेकिन जिन गाँवों में जाकर हिन्दी सिखानी थी, उनमें प्रवेश करना कठिन था| कारण यह कि गाँव के मुखिया की अनुमति के बिना वहाँ जाकर कोई काम नहीं किया जा सकता था| ऐसी परिस्थितियों में पंडित राधामोहन शर्मा कभी साइकिल पर और कभी पैदल ही किसी गाँव पहुँचते थे और मुखिया को समझाते थे कि अब देश आज़ाद होने वाला है और शीघ्र ही जनता का राज आने वाला है| तब मणिपुर के बहुमुखी विकास के लिए अपनी मातृ-भाषा के साथ ही हिन्दी की ज़रूरत भी होगी| उसके जरिए आसानी से मथुरा, काशी, वृन्दावन की तीर्थ-यात्रा की जा सकेगी| आगे चल कर हिन्दी से रोज़गार भी मिलेंगे| इसी प्रकार की कुछ बातों से वे गाँव के मुखिया को अपने पक्ष में करने के बाद गाँव के भीतर जाने की अनुमति प्राप्त करते थे और तब असली अभियान की शुरुआत होती थी| वे ग्रामवासियों को स्वयं हिन्दी सीखने और अपने बालकों को हिन्दी सीखने के लिए राजी करते थे| उसके बाद समस्या आती थी, सामग्री की| वहाँ कापी-किताब-कलम की सुविधा नहीं थी| राधामोहन शर्मा सड़क साफ़ करके या फिर किसी घर की दीवार पर ’, ‘’, ‘’, ‘’.... ‘’, ‘’, ‘लिखते थे और सभी उम्र के छात्र उन्हें याद करना शुरू कर देते थे| यह थी मणिपुर में हिन्दी के यज्ञ की शुरुआत|

पंडित राधामोहन शर्मा और थोकचोम मधु सिंह ने सबसे पहला हिन्दी प्रचार विद्यालय थोकचोम मधु सिंह के घर पर तथा दूसरा उरिपोक चेराप-कोर्ट के पास प्रारम्भ किया था| भारत के भविष्य लिए उत्साह से भरपूर इन दोनों कार्यकर्ताओं ने दोनों विद्यालयों के लिए पाठ्य-पुस्तकें अपने हाथ से लिख कर तैयार की थीं| उन्हें बहुत कम मूल्य पर बेच कर श्यामपट, चौक, तथा पानी की व्यवस्था के लिए गिलास-बाल्टी खरीदे थे| यह हिन्दी के लिए साधना थी|

पंडित राधामोहन शर्मा की हिन्दी सेवा में एक मोड भैरोदान हिन्दी स्कूलकी स्थापना से आया| इसे सेठ भैरोदान मोहता ने अपने नाम पर सन् 1933 में स्थापित किया था| उनके साथ इम्फाल के कुछ अन्य व्यापारी भी थे, जो स्कूल की प्रबंध-समिति के सदस्य थे| स्कूल की स्वस्ति-पूजा राधामोहन जी ने कराई थी| उसी समय इन व्यापारियों ने पंडित जी से प्रार्थना की कि स्कूल में हिन्दी पढाने के लिए योग्य अध्यापक नहीं मिल रहा है, अत: वे उनकी सहायता करें और भैरोदान हिन्दी स्कूल में हिन्दी पढाएँ| पंडित राधामोहन शर्मा ने बिना आगा-पीछा सोचे अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी और इस स्कूल में हिन्दी अध्यापक का काम करने लगे|

हिन्दी सेवी यमुना प्रसाद के प्रयास से इम्फाल में मणिपुर हिन्दी प्रचार सभाका गठन सन् 1940 में हुआ| पंडित राधामोहन शर्मा इस संस्था के संस्थापक अध्यक्ष बने| यही वर्त्तमान में मणिपुर राष्ट्र-भाषा प्रचार समितिके नाम से कार्य कर रही है| इसके पूर्व वे हिन्दी साहित्य सम्मलेन प्रयाग की ओर से मणिपुर में किए गर हिन्दी प्रचार कार्य में सहयोग कर चुके थे| उन्होंने सम्मलेन की विशारदपरीक्षा भी उत्तीर्ण की थी|

सन् 1953 में मणिपुर हिन्दी परिषद, इम्फालकी स्थापना हुई| पंडित राधामोहन शर्मा अट्ठाईस साल तक परीक्षा मंत्री के रूप में इस संस्था का कार्यभार संभालते रहे| इस अवधि में उन्होंने पाठ्य-पुस्तकों के निर्माण का बड़ा ऐतिहासिक कार्य किया| ये पुस्तकें मणिपुर सरकार के विद्यालयों में भी चलती थीं| इसी अवधि में उन्होंने हिन्दी भाषा के अध्ययन को सुगम बनाने के लिएहिन्दी-मणिपुरी शब्दकोशका निर्माण भी किया, जो उनका अति महत्वपूर्ण कार्य सिद्ध हुआ|

पंडित राधामोहन शर्मा ने अपने संस्कृत ज्ञान को सार्थक करते हुए दस उपनिषदों का मणिपुरी भाषा में अनुवाद किया था| इसका प्रकाशन दशोपनिशतशीर्षक से किया गया| इस कार्य की महत्ता स्वीकार करते हुए साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने सन् 1999 का अनुवाद पुरस्कार दशोपनिशत के लिए पंडित राधामोहन शर्मा को मरणोपरांत प्रदान करने की घोषणा की, जिसे पंडित जी के ज्येष्ठ पुत्र अरिबम लक्ष्मीकुमार शर्मा ने उनकी ओर से ग्रहण किया|

सम्पूर्ण जीवन हिन्दी के लिए समर्पित करने वाले राधामोहन जी ने समाज, संस्कृति, धर्म आदि के क्षेत्र में भी कोई कम कार्य नहीं किया| उन्हें 1985 में श्री गोविंदजी टेम्पल बोर्ड की सलाहकार समिति के सदस्य बनाए गए| सन् 1988 में उन्होंने श्री श्री गोविंदजी ब्रह्मसभा में व्यवस्थाकारी का पद सम्भाला| वे मणिपुर गीता मंडल और अतोम्बापू रिसर्च सेंटर के अध्यक्ष के रूप में कार्य करते रहे| पंडित जी तेरा आइडियल क्लब के संस्थापक अध्यक्ष थे और उन्होंने तेरा गर्ल्स  एम. ई. स्कूल की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी|

पंडित राधामोहन शर्मा को अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत किया गया| उनकी हिन्दी सेवाओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान देते हुए भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा ने उन्हें सन् 1995 का गंगाशरण सिंह पुरस्कारप्रदान किया| इसे पंडित जी ने भारत के महामहिम राष्ट्रपति ड़ा. शंकरदयाल शर्मा के कर-कमलों से ग्रहण किया था| इसी उपलक्ष्य में सन् 1996 में मणिपुर हिन्दी परिषद द्वारा उनका सार्वजनिक सम्मान किया गया था| जब सन् 1980 में मणिपुर में हिन्दी प्रचार के साठ वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में अनेक संस्थाओं ने सामूहिक आयोजन किया, तो उसमें राधामोहन शर्मा जी को सम्मानित किया गया| मणिपुर हिन्दी परिषद, इम्फाल ने सन् 1986 में संपन्न दीक्षांत समारोह में पंडित जी का अभिनन्दन किया था| सन् 1973 में अखिल मणिपुर हिन्दी शिक्षक संघ, इम्फाल ने उन्हें हिन्दी सेवकश्रीउपाधि प्रदान की|

 

20 मई, 1997 को पंडित अरिबम राधामोहन शर्मा इस संसार से विदा हो गए| उनके रिक्त स्थान की पूर्ति कभी नहीं हो सकती| अखिल भारतीय हिन्दी प्रचार आंदोलन को गरिमा प्रदान करने वाले राष्ट्र-सेवियों में पंडित जी हमेशा शोभा पाते रहेंगे..............

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